सही हदीसों और सलफ़े सालेहीन की व्याख्याओं की रोशनी में जानिए कि इस्लाम आत्मा, बरज़ख और मृत्यु के बाद होने वाले घटनाओं के बारे में क्या सिखाता है।
सारी प्रशंसा अल्लाह के लिए है, और अल्लाह के रसूल ﷺ, उनके परिवार और उनके साथियों पर दरूद और सलाम हो।
जब कोई व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त करता है तो उसकी आत्मा के साथ क्या होता है?
इमाम अहमद (17803) ने बराअ बिन आज़िब (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत किया कि नबी मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया:
"निश्चय ही जब कोई मोमिन बंदा दुनिया से रुख़सत होकर आख़िरत की ओर जाने लगता है, तो आसमान से सफ़ेद चेहरों वाले फ़रिश्ते उसके पास उतरते हैं, जिनके चेहरे सूरज की तरह चमकते हैं। वे जन्नत के कफ़न और जन्नत की ख़ुशबू लेकर आते हैं। फिर वे उसकी नज़र की हद तक बैठ जाते हैं। इसके बाद मलाकुल मौत (अलैहिस्सलाम) उसके सिर के पास बैठकर कहते हैं: ऐ पाक रूह! अल्लाह की मग़फ़िरत और रज़ा की ओर निकल आ। फिर उसकी रूह ऐसे निकलती है जैसे पानी का क़तरा मश्कीज़े से बहकर निकलता है... फिर उसकी रूह उसके शरीर में वापस लौटा दी जाती है और दो फ़रिश्ते उसे बिठाते हैं।"
अल-अलबानी द्वारा सहीह क़रार दिया गया, सहीह अल-जामि‘ 1676
शैख़ुल इस्लाम इब्न तैमिय्या (रहिमहुल्लाह) ने फ़रमाया:
"यह हदीस इस बात पर दलील है कि रूह शरीर से अलग होने के बाद भी बाक़ी रहती है, जो मुतकल्लिमीन की गुमराह शिक्षाओं के ख़िलाफ़ है। यह भी दलील है कि रूह ऊपर उठती और नीचे आती है, जो फ़लसफ़ियों के गुमराह विचारों के ख़िलाफ़ है। और यह कि रूह को शरीर में वापस लौटा दिया जाएगा, मृतक से सवाल किया जाएगा, फिर उसे नेमत या अज़ाब दिया जाएगा।"
मजमू‘ अल-फ़तावा, 4/292
इब्न माजा (4262) ने अबू हुरैरा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत किया कि नबी मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया:
"मरने वाले के पास फ़रिश्ते आते हैं। अगर वह नेक होता है तो कहते हैं: ऐ पाक रूह, जो पाक शरीर में थी, निकल आ... और यह बात दोहराई जाती है जब तक कि उसे उस आसमान तक पहुँचा दिया जाता है जिसके ऊपर अल्लाह है। और अगर वह बुरा व्यक्ति होता है तो कहते हैं: ऐ गंदी रूह, जो गंदे शरीर में थी, निकल आ... फिर उसे आसमान से वापस लौटा दिया जाता है और वह क़ब्र की ओर चली जाती है।"
अल-अलबानी द्वारा सहीह क़रार दिया गया, सहीह इब्न माजा
ये हदीसें बताती हैं कि मृत्यु और दफ़न के बीच आत्मा के साथ क्या होता है। यदि मृत व्यक्ति मोमिन हो तो फ़रिश्ते उसे ख़ुशख़बरी देते हैं, उसकी रूह को ख़ुशबू लगाते हैं और उसे ऊँचे आसमान तक ले जाते हैं। अल्लाह उसका आमाल-नामा ‘इल्लीयीन में दर्ज करता है, फिर क़ब्र के सवालों के लिए उसकी रूह को शरीर में वापस लौटा दिया जाता है।
और यदि वह काफ़िर हो तो फ़रिश्ते उसे अज़ाब की ख़बर देते हैं, आसमान के दरवाज़े उसके लिए बंद कर दिए जाते हैं, उसकी रूह को शरीर में वापस लौटा दिया जाता है और क़ब्र का अज़ाब शुरू हो जाता है।
शैख़ुल इस्लाम इब्न तैमिय्या (रहिमहुल्लाह) ने फ़रमाया:
"सभी सहीह और मुतावातिर हदीसें इस बात पर दलील हैं कि रूह शरीर में वापस लौटाई जाएगी। कुछ उलमा ने कहा कि सवाल केवल शरीर से होगा, रूह से नहीं; लेकिन जम्हूर उलमा ने इससे इख़्तिलाफ़ किया है। इसी तरह इब्न मयसरा और इब्न हज़्म ने कहा कि सवाल केवल रूह से होगा, शरीर से नहीं; लेकिन अगर ऐसा होता तो क़ब्र का रूह से कोई संबंध न होता।"
मजमू‘ अल-फ़तावा, 5/446
ये सभी मामले ग़ैब से संबंधित हैं, जिन पर ईमान लाना मुसलमानों पर वाजिब है। इनकी कैफ़ियत के बारे में सवाल करना उचित नहीं, क्योंकि बरज़ख की हक़ीक़त अल्लाह के सिवा कोई नहीं जानता।
शैख़ इब्न उसैमीन (रहिमहुल्लाह) से क़ब्र में रूह के वापस लौटने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने फ़रमाया:
"रसूलुल्लाह ﷺ से साबित है कि जब इंसान मर जाता है तो उसकी रूह उसकी क़ब्र में उसके पास लौटा दी जाती है, फिर उससे उसके रब, उसके दीन और उसके नबी के बारे में सवाल किया जाता है। अल्लाह ईमान वालों को मज़बूत रखता है, इसलिए वे सही जवाब देते हैं। लेकिन काफ़िर या मुनाफ़िक़ परेशान हो जाता है और जवाब नहीं दे पाता। क़ब्र में रूह की ज़िंदगी, यानी बरज़ख की ज़िंदगी, दुनिया की ज़िंदगी जैसी नहीं है, और हम पर केवल इस पर ईमान लाना और इसे स्वीकार करना वाजिब है।"
फ़तावा नूर ‘अला अद-दर्ब, 4/2
और अल्लाह ही सबसे अधिक जानने वाला है।